jamshedpur-साकची गुरुद्वारा कमेटी मामले पर सीजीपीसी प्रधान सरदार भगवान सिंह ने सिख संगत को दिया स्पष्ट संदेश।

SIKH MEDIA
DAILY DOSE 24/7
Note-All the aforementioned points are based on the content sent to the media by CGPC President Sardar Bhagwan Singh.
जमशेदपुर- साक्ची गुरुद्वारा कमेटी विवाद में फैसले के बाद साक्ची गुरुद्वारा में प्रधान सरदार निशान सिंह ने संगत को जानकारी देने के उद्देश्य से एक प्रेसवार्ता बुलाई, जिसमें उनके अधिवक्ता भी शामिल हुए। प्रेसवार्ता के दौरान निशान सिंह ने मीडिया को चरणबद्ध तरिके से कोर्ट के फैसले के बारे में अवगत कराया।
इधर सेन्ट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान सरदार भगवान सिंह ने उन्हें जवाब देते हुए संगत को स्पष्ट जानकारी देने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं का उल्लेख किया और जवाब मांगे.
25 लोगों की जनरल बॉडी बैठक कर चुनाव से बचने की कोशिश की गई और अन्य योग्य उम्मीदवारों को दरकिनार कर स्वयं अध्यक्ष बनने की कोशिश की गई, साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में यदि लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होना था, तो सभी योग्य उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का समान अवसर मिलना चाहिए था।
कुछ लोगों की बैठक कर चुनावी प्रक्रिया से बचने और अन्य उम्मीदवारों को दरकिनार कर स्वयं पद पर बने रहने की कोशिश को संगत किस रूप में स्वीकार करेगी, यह सवाल आज भी सामने है। जब के सी जी पी सी द्वारा कराई गई वोटिंग के दिन हजार से ज्यादा लोगों ने वोटिंग की वह साकची की हीं संगत थी.
महत्वपूर्ण बात.
सरदार भगवान सिंह ने एक महत्वपूर्ण बात पर रोशनी डालते हुए कहा कि निबंधन विभाग द्वारा कोई आदेश निर्गत नहीं किया गया है, सीजीपीसी संविधान 2007 से निबंधित है निबंधन को बनाए रखने के लिए समय-समय पर निबंधन विभाग को सारी जानकारी दी जानी चाहिए थी, उस त्रुटि को दूर करने को कहा गया है, उन्होंने कहा कि साक्षी का निबंधन 6 वर्ष पूर्व हुआ है, इस तरह की त्रुटि उनके निबंधन में भी है, दो-चार लोगों द्वारा चोरी छुपे संगत के बिना सहमति के करवाया गया है इसकी पूरी जानकारी निबंधन विभाग को दी जाएगी
CGPC किसी व्यक्ति की निजी संस्था नहीं है– BHAGWAN SINGH
CGPC पूरी संगत की संस्था है और इसका अपना संविधान है। किसी को पद चाहिए तो संविधान भी मानना पड़ेगा।सदस्यता चाहिए तो संस्था के नियम भी मानने पड़ेंगे।और विवाद होने पर CGPC की संवैधानिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
कैंटीन का मामला
सरदार भगवान सिंह ने छात्रावास की कैंटीन का जिक्र करते हुए कहा कि CGPC का यह भी स्पष्ट मत है कि गुरुद्वारा और उससे जुड़ी संपत्ति किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि संगत की अमानत होती है।
साकची की संगत के साथ धोखा या अपनी ही संस्था के पैरों पर कुल्हाड़ी? भगवान सिंह
जमशेदपुर l सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान भगवान सिंह ने कहा कि साकची कमेटी के अपने संविधान में दूसरी संस्था की सदस्यता पर रोक, फिर CGPC की सदस्यता क्यों ली थी यह बात उन्होंने साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा जारी हालिया प्रेस विज्ञप्ति के बाद अब इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। सवाल किसी व्यक्ति के पद पर बने रहने या किसी व्यक्ति विशेष के विरोध का नहीं, बल्कि संगत, संविधान और संस्था की मर्यादा का है।
यदि साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अपने संविधान में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया गया है कि वह किसी अन्य संस्था की सदस्य नहीं हो सकती, तो फिर साकची कमेटी का सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (CGPC) का सदस्य बने रहना किस संवैधानिक आधार पर था
एक ओर CGPC की सदस्यता और उसके संस्थागत ढांचे का हिस्सा बने रहना और दूसरी ओर विवाद के समय CGPC के संविधान एवं उसकी भूमिका को स्वीकार नहीं करना—इन दोनों बातों पर संगत के सामने जवाब देना आवश्यक है।
CGPC का संविधान क्या कहता है, यह जमशेदपुर की संगत के सामने कोई छिपी हुई बात नहीं है। जब किसी गुरुद्वारा कमेटी में विवाद उत्पन्न होता है और विवाद इतना गंभीर हो जाता है कि उसका असर गुरुद्वारा प्रबंधन तथा संगत की एकता पर पड़ता है, तो CGPC की भूमिका निभाना उसका अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका दायित्व और जिम्मेदारी भी है।
फिर सवाल यह है कि CGPC को स्वीकार करते हुए उसका पद चाहिए, उसकी सदस्यता चाहिए, उसकी व्यवस्था में प्रतिनिधित्व चाहिए, लेकिन जब CGPC अपने संविधान के अनुसार किसी विवाद में हस्तक्षेप करती है तो उसी संविधान को मानने से इनकार क्यों
यह कैसी व्यवस्था है कि पद और संस्था चाहिए, लेकिन संस्था का संविधान स्वीकार नहीं
संगत की भावना को नजरअंदाज करने का अधिकार कुछ लोगों को किसने दिया?
साकची की संगत ने चुनाव में बड़ी संख्या में मतदान कर अपनी राय व्यक्त की। जब संगत किसी व्यवस्था और अपनी सिख संस्थाओं के साथ जुड़े रहने की भावना रखती है, तो क्या दो-चार या दस लोग मिलकर अपनी सुविधा और अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरी कमेटी को CGPC से अलग करने का फैसला कर सकते हैं?
संगत किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है और कोई भी संस्था किसी व्यक्ति की कुर्सी बचाने का माध्यम नहीं बन सकती।
यदि किसी व्यक्ति विशेष से व्यक्तिगत मतभेद हैं, तो वे व्यक्ति तक सीमित रहने चाहिए। किसी व्यक्ति से मतभेद होने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पूरी संस्था और उसकी संवैधानिक व्यवस्था से ही दुश्मनी कर ली जाए।
संविधान में आपत्ति है तो संशोधन का रास्ता खुला है लेकिन संविधान में आपत्ति होने के नाम पर पूरी संस्था से ही संबंध समाप्त कर लेना कोई समाधान नहीं है।
संगत के सामने यह भी सवाल है कि जब साकची कमेटी CGPC की व्यवस्था का हिस्सा रही है, तो विवाद उत्पन्न होने के बाद अचानक CGPC के संवैधानिक अधिकार और भूमिका को ही नकारने का हक किसने दिया
मामला व्यक्ति का नहीं, संस्था का है-BHAGWAN SINGH
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि CGPC का संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है। यदि किसी को भगवान सिंह से व्यक्तिगत विरोध है, तो वह व्यक्ति तक सीमित रह सकता है।यह अलग विषय है सीजीपीएससी में ऐतिहासिक काम हुए हैं कैंटीन जैसे गंभीर मसलों की भी तकलीफ है लेकिन वह तो संगत की संपत्ति है भगवान सिंह किसी को कैसे दे सकता था
SDO के आदेश को लेकर अदालत जाना और विवाद को लंबा खींचना भी सबके सामने है
यह भी तथ्य है कि SDO से जुड़े मामले को लेकर न्यायालय का रास्ता अपनाया गया और मामला लंबे समय तक चलता रहा। यदि किसी निर्णय या प्रक्रिया से आपत्ति थी तो पंथक न्याय के लिए तख्त श्री पटना साहिब अकाल तख्त साहब क्यों नहीं गए
सिख संस्थाओं का उद्देश्य किसी व्यक्ति की गद्दी को स्थायी बनाना नहीं, बल्कि संगत की सेवा और संस्था की मर्यादा को बनाए रखना है।
CGPC साकची की संगत के साथ है.
CGPC का स्पष्ट कहना है कि हमारा विरोध साकची की संगत से नहीं है। CGPC साकची की संगत के साथ है।
हमारा विरोध किसी व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत दुश्मनी का नहीं है। हमारा सवाल केवल इतना है कि साकची की संगत के नाम पर कुछ व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत लड़ाई को पूरी संस्था की लड़ाई क्यों बना रहे हैं?
उन्होंने कहा संगत के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।संगत की भावना का सम्मान होना चाहिए।CGPC संविधान का सम्मान होना चाहिए।
और सबसे बढ़कर, सिख संस्थाओं की मर्यादा का सम्मान होना चाहिए।
किसी व्यक्ति की कुर्सी बचाने के लिए संस्था को कमजोर करना न संगत के हित में है और न ही सिख कौम के।व्यक्ति आते-जाते हैं, पद आते-जाते हैं, लेकिन संस्थाएं और उनका संविधान आने वाली पीढ़ियों की अमानत होते हैं।
सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का पक्ष
व्यक्ति से मतभेद हो सकता है, लेकिन संस्था से दुश्मनी नहीं हो सकती। कुर्सी के लिए संविधान से समझौता नहीं हो सकता।और कुछ लोगों के फैसले से पूरी संगत की इच्छा को दबाया नहीं जा सकता।
All the aforementioned points are based on the content sent to the media by CGPC President Sardar Bhagwan Singh.
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